आज मैंने Reddit पर एक वीडियो देखा, और उसे देखकर मुझे बहुत गहरा दुख हुआ। मैं उसे पूरी तरह शब्दों में बयान भी नहीं कर सकता, लेकिन कोशिश करता हूं।

एक लड़की थी, शायद सत्रह-अठारह साल की, उन्नीस से ज्यादा नहीं। वो एक लड़के के साथ थी। कुछ लोग उस लड़के को मार-पीट रहे थे, खींच-तान रहे थे। और उनमें से एक लड़के ने, जिसने अपना चेहरा छिपा रखा था, उस लड़की को उठा लिया और उसके साथ बहुत घिनौना, हैवानियत भरा बर्ताव किया । देखकर मुझे पहले तो explain करना भी मुश्किल लगा, इतना दुख होता है यार यह सब देखकर। मेरी दो बेटियां हैं, सोचो उन्हें देखकर मुझे कैसा लगता होगा। उस लड़की के मां-बाप अगर वो वीडियो देखेंगे, तो टूट ही जाएंगे।
ऐसे लोगों को हमारे देश में सरेआम पर खड़ा करके सज़ा देने की जो कमी है, वो बहुत बड़ी कमी हो गई है हमारे यहां। शायद यह शुरू से ही है। उस लड़के की हिम्मत देखो कि उसने एसा किया, और उसे सरकार का, कानून का एहसास तक सा डर नहीं था कि मुझे सज़ा भी मिलेगी। इसीलिए तो उसकी इतनी हिम्मत हो गई। मुझे समझ ही नहीं आता कि इन लड़कों को घर पर क्या सिखाया जाता है, ये इस तरह का बर्ताव कैसे कर लेते हैं।
यह कहना बहुत cliché हो गा कि मैं बोलूं भाई, इसकी मां-बहन नहीं हैं क्या — उनकी मां-बहन obviously होंगी, लेकिन सवाल यह है कि उसके दिमाग में यह बात आती ही नहीं कि यह गलत है। उसका माइंडसेट एंटी-सोशल जैसा ही लगता है। उसे हल्की सी भी झिझक नहीं थी कि ये सब करना गलत है।
और बड़ी बात यह है — अगर रात को कोई लड़की किसी लड़के के साथ घूम रही थी, तो इन लोगों की सोच यह होती है — यह लड़की ‘characterless’ है, हमारा हक है, हम कुछ भी कर सकते हैं। यह सोच मुझे सबसे ज्यादा खतरनाक लगती है। वो लड़की जो भी कर रही थी, यह उसकी मर्जी थी, यह कोई excuse नहीं बन सकता कि उसके साथ कुछ गलत किया जाए। चाहे उसके मां-बाप नाराज़ होकर भी यह कहें कि मेरी बेटी जो भी करे, तुम कौन होते हो कुछ कहने वाले — उसे हाथ लगाने का हक किसी को नहीं।
इसमें एक और चीज़ मुझे बहुत परेशान करती है — victim blaming। मुझे समझ आता है लोग victim blaming क्यों करते हैं — जिन्होंने यह किया, लोग उन्हें पूरी तरह blame नहीं करते, बल्कि जो रास्ता ढूंढते हैं वो यह होता है कि लड़की या उसके साथ वाले लड़के को कैसे blame किया जाए। मैंने कई लोगों को यह कहते देखा कि ‘इसका बॉयफ्रेंड निकम्मा है’ — पहले तो यह समझा जाए कि वो लड़का उसके साथ था ही क्या, या सच में बॉयफ्रेंड था भी कि नहीं। लेकिन ‘बॉयफ्रेंड’ कहकर लोग उस लड़की को demean करना चाहते हैं, वो यह कहना चाहते हैं कि देखो, यह तो boyfriend-girlfriend हैं, तो इसे मोरली करप्ट ठहरा देंगे। दूसरी तरफ बहुत से लोग khud को vigilante बनाना चाहते हैं — मैंने सुना किसी को यह कहते, ‘इस तरह की vigilante कार्रवाई भी थोड़ी गलत है।’ मेरी नज़र में तुम होते कौन हो vigilante करने वाले? समाज ने इसीलिए पुलिस बनाई थी कि वो लोगों का ख्याल रखे। हां, भारत में पुलिस कई बार निकम्मी और नाकारा साबित होती है, वो एक अलग दिक्कत है, उस पर लंबी बात हो सकती है, लेकिन इससे ऐसा nahi हो जाता कि आप लड़की को ही blame करने लग जाओ।
और मुझे सबसे ज्यादा अजीब बात यह लगती है कि लोग कभी इसे अपने ऊपर लगाकर क्यों नहीं सोचते। लोग बहुत आसानी से यह सोच लेते हैं — ‘हमारे साथ तो कुछ नहीं होगा, ये तो पता नहीं कौन लोग हैं किस दुनिया से आते हैं’। लेकिन जब खुद उनके साथ या उनके परिवार के साथ हो, तब जवाब बिल्कुल अलग होगा। मैंने बार-बार सुना है कि जब लोगों के साथ कुछ अजीब सा होता है — नेचरल डिज़ास्टर हो, या बम ब्लास्ट जैसी आदमी-साख्ता आफत — तो वो कहते हैं, ‘मुझे लगा मैं किसी फिल्म में हूं, यह फिल्म का set है।’ इससे पता चलता है कि हम खुद को रियलिटी से कितना डिसोसिएट कर चुके हैं — हमें लगता है हम तो अलग ही हैं, और बाकी सब दूसरी दुनिया है। लोग यह भूल जाते हैं कि तुम्हारे साथ भी कहीं भी कुछ भी हो सकता है।
दूसरी बात, यह केस हिंदुस्तान में पहली बार नहीं हुआ। और कुछ लोग यह कहकर इसे trivialise करते हैं कि ‘यह तो और देशों में भी होता है’। यह सच हो सकता है कि और देशों में भी होता हो, लेकिन इससे हमारे यहां होने को justify नहीं किया जा सकता। आज के जमाने में, AI और गूगल के जमाने में, data निकालना कोई मुश्किल काम नहीं है। मैं यहां anecdotally ही बता रहा हूं — मैंने खुद consistently यह देखा है कि भारत में पुरुषों का रवैया औरतों के प्रति behaviour बहुत सी दूसरे देशों से कहीं ज्यादा खराब है। तो सिर्फ यह कहकर कि और देशों में भी होता है, आप इसे नहीं टाल सकते — historically, consistently आप लड़कियों के साथ behaviour में गलत हो।
मैं खुद दो बेटियों का पिता हूं, और यह बात मुझे बहुत सोचने पर मजबूर करती है। मुझे कई बार समझ नहीं आता कि जिन लोगों की खुद बेटियां हैं, वो भी कभी-कभी victim blaming करते हुए दिख जाते हैं। आपको समझ नहीं आता कि तुम्हारे साथ भी ऐसा हो सकता है? हां, अगर ठंडे दिमाग से सोचों, तो यह understandable है कि जिसकी बेटी नहीं है, उसे उतना फर्क नहीं पड़ता। लेकिन आप देश नहीं बदलना चाहोगे, चीज़ें नहीं बदलना चाहोगे, culture नहीं बदलना चाहोगे, तो वो कभी नहीं बदलेगा।
इसमें किसी एक प्रधानमंत्री की सीधी गलती थोड़ी ही है — आप ऐसे सीधे किसी एक व्यक्ति को blame नहीं कर सकते, यह culture की problem है। लेकिन हां, मुझे लगता है जो लोग इस तरह की हरकतें करते हैं, उन्हें सपोर्ट करने वाली पॉलिटिक्स साइड बाकी से और रिप्रेज़ेंटेटिव — right-leaning, conservative — सोच के आसपास ज़्यादा मिलती है। मुझे पूरा यकीन नहीं, बस एसा लगता है कि जो थोड़े से liberal, open-minded, forward-looking लोग हैं, वो इस तरह की हरकतें कम करते हैं।
प्रॉब्लम यह है कि यह खबर Reddit पर आई, शायद Instagram पर भी चलेगी, हूहा मचेगा, शायद इन लोगों को पकड़ भी लिया जाए। लेकिन सवाल यह है कि एसे रोज़ अगर हज़ारों केस होते होंगे, तो उनमें से कितने सामने आते हैं। समस्या यही है — जिस भी लड़की की वीडियो नुमाइश हुई, उसी से उसकी बेइज्जती भी हो गई, जबकि गलती रत्ती भर उसकी नहीं — ऐसे में आप कह सकते हैं कि नुकसान सिर्फ उनका ही हुआ। और मुझे लगता है ऐसे हज़ारों केस रोज़ होते होंगे, उनमें से मुश्किल से कोई सामने आता होगा।
इसे आप सिंगल आउट नहीं कर सकते — यह सिर्फ हिंदुस्तान में नहीं होता, पूरी दुनिया में होता है। लेकिन हर चीज़ की एक limit होती है, एक frequency होती है। चोरी पूरी दुनिया में होती है, इसका यह मतलब नहीं कि आप हिंदुस्तान की चोरी को जस्टिफाई कर दो यह कहकर कि चोरी तो सब जगह होती है। देखना यह पड़ता है कि per capita कितनी होती है, और उसके बाद सज़ा कितनी मिलती है। molestation के साथ भी यही बात है। मैंने खुद नोट किया है भारत में लड़कों को एसे घूरते हुए, जैसे उन्हें पता ही नहीं कि वो staring कर रहे हैं।
मुझे यह बात नोट करते हुए याद आई कि जब मैं UK आया, तो यह फौरन सा फौरन सा नोटिस हुआ। इंडिया में जब मैं अपनी बहन या Runa के साथ घूमता था, तो मैंने देखा है कि लोग पता नहीं कैसे घूरते हैं — गॉप कर रहे ही हों जैसे। यहां मैंने कम से कम एतनी तहज़ीब लोगों में देखी कि लोग नज़र नहीं मिलाते, जबरदस्ती की नज़रों से घूरते नहीं, और आंख भी मिल जाए तो hello कर देते हैं। इंडिया में मुझे यही एक बहुत बड़ा Indian grain सा लगता है — मैंने यही बर्ताव पाकिस्तान में भी देखा है — एक वीडियो देखी थी जिसमें करीब सौ आदमीयों ने दो लड़कियों के साथ ऐसी बदतमीज़ी की, जैसे चील और कौवों की तरह उन पर टूट पड़े हों।
मुझे लगता है इसकी एक बड़ी वजह यह है कि लड़के और लड़कियां आपस में घुलते-मिलते ही नहीं — थोड़ा सा भी घुलते-मिलते हों, तो शायद उन्हें एहसास हो कि लड़की भी अपनी ही जैसी है, मेरी जैसी सोच की है। लेकिन लड़कियों को उस तरह लेने की जगह घरों में बंद करके रख दिया जाता है।
और जिस लड़के ने यह किया, उसके घर वालों ने उसे यही सिखाया होगा। मैं हमेशा एक बात कहता हूं — जैसे कुत्ता खराब नहीं होता, कुत्ते का मालिक खराब होता है। मैंने महसूस किया है — कुत्ता तभी बदतमीज़ी करता है जब उसका मालिक खुद लड़ने के लिए तैयार रहता है। जो आदमी समझदार है, फ़ालतू के पंगों में नहीं पड़ता, उसका कुत्ता भी वैसा ही रहता है। बच्चों के साथ भी यही होता है — जैसे आप उन्हें पालते हो, aggression और violence से भरे हुए, वही उनमें आ जाता है। इस लड़के को भी यह कहीं न कहीं से सिखाया गया होगा।
यह एक अकेला केस नहीं है। निर्भया का केस याद है सबको — यह उसी सोच का एक और रूप है, शायद mild फॉर्म — लेकिन वही सोच। उस लड़की के दिल पर क्या गुज़ी होगी, मैं सोच के दुखी हो जाता हूं। क्या सोचती होगी वो अपने देश के बारे में।
मुझे नहीं पता इसका कोई एक इलाज़ है भी या नहीं। मुझे लगता है सदियां लगेंगी इसे बदलने में। यही फर्क है किसी भी society में — कोई society कितनी forward है, कोई कितनी backward। इस मामले में मैं इसे एक backward सोच ही कहूंगा। मुझे याद आता है, मैंने कहीं पढ़ा था कि जब Vasco da Gama इंडिया आया था, तो उसने लिखा था कि यहां के लोग बहुत ignorant हैं। मुझे उस वक्त लगा था कि कैसी बेतुकी बात कह दी उसने, लेकिन ऐसी चीज़ें देखकर लगता है — शायद सच में कहीं न कहीं कुछ था उसमें। जब आप इस तरह वहशीपन से behave करते हो, तो something is wrong with you।
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