आजकल मैं YouTube पर एक वीडियो देख रहा था जिसमें एक आदमी, जो पाकिस्तान का रहने वाला है, basically अपनी कार से पाकिस्तान से लंदन तक आ रहा है। अजीब बात है ना? कोई आदमी इतनी दूर से आता है, तो हम सोचते ही नहीं कि ऐसा हो सकता है। हमें लगता है कि लोग इतनी दूर सिर्फ हवाई जहाज से ही आ सकते हैं। कोई कार से इतना लंबा सफर कैसे तय कर सकता है?
यह बात मुझे सबसे पहले आज से 20-25 साल पहले पता चली थी। मुझे एक दोस्त मिला था जब मैं मार्गेट में रहता था, Flat नंबर 6 में। उसका नाम मोहम्मद था और वह पाकिस्तान से था। उसने बताया था कि उसके ताऊ जी इंग्लैंड में रहते थे, और वह कार से इंग्लैंड से पाकिस्तान गए थे। मुझे यह बात बिल्कुल यकीन नहीं हुई। ऐसा नहीं कि मैंने उससे कहा कि भाई, यह हो नहीं सकता, लेकिन मुझे बहुत अजीब लगा।
फिर मैंने Map देखा, और समझ आया — हां, अगर logically सोचा जाए, तो इंग्लैंड खुद एक टापू है, लेकिन जैसे ही आप इंग्लैंड से बाहर निकल कर फ्रांस पहुंचते हैं, वहां से आगे सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है। फ्रांस से नीदरलैंड होते हुए, पूरा यूरोप cross करते हुए, Eastern यूरोप और फिर तुर्की तक — और तुर्की से आगे भी ज़मीन जुड़ी हुई है, क्योंकि उसके बाद ईरान है, अफ़ग़ानिस्तान है, पाकिस्तान है, और फिर इंडिया। मतलब आप कहीं भी जा सकते हैं, क्योंकि रास्ता ज़मीन का है। यूरोप को हम एक अलग महाद्वीप कहते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि वह चारों तरफ से समुद्र से घिरा हुआ है। यह बात भी मुझे बहुत दिलचस्प लगती है।

इस बारे में सोचते हुए मुझे याद आया कि पहले लोग सच में सड़क के रास्ते ऐसा सफर करते थे। “Hippie Trail” बड़ी मशहूर रही है — जिसमें hippies पैसे बचाते हुए, बस से, इंग्लैंड से चलकर पूरे रास्ते इंडिया और नेपाल तक पहुंचते थे। अगर आप search करें तो Hippie Trail के बारे में काफी कुछ मिल जाएगा। बड़ी दिलचस्प बात है कि लोग एक जगह कुछ घंटे रुकते, एक दिन सफर करते, फिर रुकते, फिर दो दिन सफर करते — इस तरह मज़े लेते हुए यह सफर तय करते थे।
लेकिन फिर माहौल बदल गया। Politically borders बने, और Middle East में, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान में कई borders मुश्किल हो गए। वहां जंग और लड़ाइयां होती रहीं, जिससे चीज़ें थोड़ी कठिन हो गईं। लेकिन अगर सोचा जाए, तो यह अब भी संभव है — बस फ्रांस पहुंचना काफी है, उसके बाद ज़मीन के रास्ते आगे बढ़ा जा सकता है।
मैं सोचता हूं, कार से जाना कितना बड़ा फैसला होगा — अपनी कार से, या कम से कम एक भरोसेमंद कार होनी चाहिए। कोई भी उठाकर कार नहीं चला सकता, क्योंकि खतरे तो हैं। डर लगता है कि कार खराब हो जाए, कोई दिक्कत हो जाए, कुछ भी हो सकता है — accident से लेकर गलत लोगों से मिल जाना तक। लेकिन मुझे लगता है, दुनिया में ज़्यादातर लोग अच्छे हैं, अच्छे लोग ही मिलते हैं सफर में।
फिर भी सोचिए, कितना गज़ब का exposure होता होगा। आप कुछ घंटे या एक दिन चलते हैं, और पूरा देश बदल जाता है — culture बदल जाता है, भाषा बदल जाती है। मुझे लगता है इससे बेहतर दुनिया को समझने का तरीका शायद ही कोई हो। बस हिम्मत चाहिए, पैसा चाहिए, और एक भरोसेमंद कार चाहिए। अगर यह सब मिल जाए, तो सोचिए कितना मज़ा आता होगा। मैं अक्सर इस बारे में सोचता रहता हूं।
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